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January 26, 2013 / Nikhil Jain

Republic Day’s Poem at School…


मेरी कविता जो मैंने आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर विद्यालय में सुनाई।


पश्चिमी संस्कृति के आते-आते
देखो, हिन्दी का क्या हाल हुआ,
कहीं सिमैयाँ हुईं chowmein
तो कहीं झरना  fall  हुआ;

मगगे को mug  बनाया
तो कहीं कंघा comb,
आंतकवादी तो जैसे इज्ज़तदार terrorist हो गए
और बम हुआ bomb;

बलब को bulb हो गया
तो कहीं साबुन को soap,
भगवन्, आप तो God हो गए
पर, उम्मीद-उम्मीद खोकर हो गई hope;

सिनेमा-घर आजकल housefull हो गए
तो कहीं बाजार हुए mall और market,
अपने घर की गुड़ की  पट्टी छोड़कर,हम
आज खाते हैं munch,eclairs और kitkat;

जिस भाषा का प्रयोग
करते हैं दूसरे देशों के भी लोग,
उसी भाषा को त्यागने का
न जाने हमको कैसा लगा है रोग?
                                              

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