कविता : “मेरे सपनों का भारत” (written for Independence Day…)


भ्रष्टाचार का नामोनिशान न जहाँ
रोज़गार जहाँ सब जन पाते हैं,
कौन गरीब है-कौन अमीर?
भेदभाव नाम सहित भूल जाते हैं;
लोग हर धर्म-हर जाति के
जहाँ एकता के रंग में घुल जाते हैं,
मेहनत और लगन से यूँ ही
हर कठिन काम को कर जाते हैं;
सत्य और प्रेम हैं जहाँ की इबारत,
कुछ ऐसा ही है, मेरे सपनों का भारत…

आँधी-तूफान तृण हैं आगे जिसके
विकट परिस्थितियाँ भी नहीं बचतीं शेष,
समान हैं सबके आधिकार जहाँ
ऐसा विकसित है मेरे  स्वप्न का भारत देश;
जिस धरती की माटी, है ताकत उन वीरो की
हर शत्रु-सेना जिससे सदा भय खाती है,
ऐसे देश में मेरे, बेटी को जन्म देने से पहले
न ही कभी कोई माँ कतराती है;
शिक्षा और संस्कार हैं जिसकी विरासत,
कुछ ऐसा ही है, मेरे सपनों का भारत…

लाखों हैं देखे सब ने स्वप्न
कुछ हमने देखे,कुछ महापुरुषों ने,
पर कहाँ सच कर पाए हम?
सपने थे और रह गए सपने;
स्वार्थ की मँझधार में फंसे हैं
आलस्य का यह दलदल गहन,
भौर हो चली कब की, मित्रों
जागो! सफलता का शत्रु है शयन;
हमारी एकता ही है देश की ताकत,
कुछ ऐसा ही है, मेरे सपनों का भारत…

(स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आओ मित्रों, सच करें अपने सपनों का भारत)

This poem is written for Independence Day which got published at Inspiration Unlimited e-magazine (Hindi).

©Li’l Poet NJ ( Nikhil Jain ) 2013

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